जातिगत समीकरण और सत्ता की चाह बना 'आरक्षण' का नया खेल - संजीव पूरी
भारत में आरक्षण की मांग पहली बार फूले के द्वारा 1882 में उठाई गई थी। इसके बाद 1902 में कोल्हापुर के राजा छत्रपति शाहूजी महाराज के द्वारा की गई।
1921 में मैसूर रियासत ने मिलर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण की शुरुआत की।
1932 (पूना पैक्ट) जिसमें महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर अंबेडकर के बीच समझौते के बाद दलित जातियों, शेड्यूल कास्ट के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व सीटों का आरक्षण तय हुआ।
देश की आज़ादी के बाद जब भीमराव अंबेडकर के द्वारा संविधान का निर्माण किया गया। उसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण देने का प्रावधान किया गया, परंतु यह आरक्षण सिर्फ आने वाले दस वर्षों के
लिए सीमित था बाद में हर 10 वर्ष के बाद संशोधन करके समय सीमा बढ़ाई जाती रही। शुरुआत में नौकरियों में अनुसूचित जाति के लिए 12.5% और अनुसूचित जनजाति के लिए 5% आरक्षण तय हुआ था, जिसे बाद में (1970 और 1982 के संशोधनों के बाद) बढ़ाकर अनुसूचित जाति के लिए 15% और अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5% कर दिया गया।
अब अगर बात करें ओबीसी आरक्षण की तो ओबीसी आरक्षण देने का विचार सरकार का था, परंतु ओबीसी में कौन-कौन सी जात आती है उसका विश्लेषण करना बहत कठिन था जिसके लिए काका कालेलकर की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई जिसकी रिपोर्ट 1955 में प्रस्तुत की गई थी। जिसमें 2399 पिछड़ी जातियों की पहचान कर सूची तैयार की गई परंतु काका कालेलकर इस रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं थे। उनका कहना था कि आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े हुए को मिलना चाहिए ना कि जातीय आधार पर इसलिए उस समय की कांग्रेस सरकार के द्वारा यह रिपोर्ट ठन्डे बस्ते में भेज दी गई।
1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हो चुका था। जिसमें मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाया गया अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री और लालकृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया गया।
जनता पार्टी के द्वारा ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए बी पी मंडल के अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई। जब कांग्रेस पार्टी सत्ता में आई तो कांग्रेस ने उस रिपोर्ट को दोबारा ठंडे बस्ते में डाल दिया। अब जब 1989 में वीपी सिंह की जनता दल पार्टी सत्ता में आई जिसके सहयोगी पार्टी भारतीय जनता पार्टी थी। वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनते ही 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने का फरमान दे दिया गया, जिसका जबरदस्त विरोध पूरे देश में हुआ। छात्र सड़कों पर आ गए छात्रों ने बहुत संख्या में आत्मदहा किया छात्रो का
आंदोलन उग्र और बहुत लंबा चला परंतु उस समय की सरकार पीछे नहीं हटी। अगर उस समय जनरल कैटेगरी (स्वर्ण समाज) सड़कों पर उतर जाते तो आज स्थिति कुछ और होती उस समय जनरल कैटेगरी में जाट भी आते थे।
परंतु वर्ष 2000 की भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में बनी उत्तर प्रदेश सरकार ने जाटों को आरक्षण देने की शुरुआत की।
अब जब 2014 में भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई, तब जनरल कैटेगरी बहुत खुश हुई। अब जनरल कैटेगरी ने सोचा कि यह पार्टी हमारी अपनी पार्टी है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के कोर वोटर तो जनोल कैटेगरी ही है। प्राने अनुभव से भी जनरल कैटेगरी अब तक परिचित नहीं थे, वो समझ नहीं पा रहे थे कि उनकी गर्दनँ शेर के जबड़े में हैं और शेर का स्वभाव बदलता नहीं है
अब 2018 में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा हरिजन एक्ट में सीधे गिरफ्तारी के लिए रोक लगाई सुप्रीम कोर्ट के द्वारा कहा गया कि पहले अभियुक्त का पक्ष भी सुना जाना चाहिए है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत का भी प्रावधान रखा परन्तु सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी के द्वारा अध्यादेश लाया गया जैसा अध्यादेश कांग्रेस के समय में शाहबानो केस में लाया गया था अब भाजपा के द्वारा भी उसी तरह का अध्यादेश संशोधन बिल लाया गया। जिसमें हरिजन एक्ट में सीधा गिरफ्तारी होगी अभियुक्त को सुना नहीं जाएगा अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं होगा।
इसके बाद भी जनरल कैटेगरी ने आवाज़ नहीं उठाई, जनरल कैटेगरी की गर्दनों में तलवार चल रही थी, परन्तु जनरल कैटेगरी उस कबूतर की भांति आंख बंद करके बैठी हुए थी, जिस कबूतर को बिल्ली झपट्टा मार रही थी।
अब हाल ही में भाजपा की केंद्र सरकार के दवारा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मिलने वाली मुआवजा राशि को 40% तक बढ़ाने का प्रस्ताव लाया जा रहा है। यह राशि न्यूनतम ₹1 लाख और अधिकतम ₹12 लाख तक हो सकती है। जिसकी तैयारी लगभग हो चुकी है। इस अधिनियम का दुरुपयोग होने का भी खतरा है जिसके कारण जनरल कैटेगरी का शोषण हो सकता है।
अब अगर यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) के बारे में कहें तो यूजीसी के नियमों के अनुसार, 1998 की 'एससी/एसटी सेल' स्थापना संबंधी मार्गदर्शिका और 2012 के 'इक्विटी रेगुलेशंस' पर आधारित थे, जिनमें केवल एससी और एसटी वर्ग पर विशेष फोकस था परन्तु 13 जनवरी 2026 में केंद्र सरकार के द्वारा यूजीसी रूल में बदलाव कर दिया गया और लागू कर दिया गया कि अब इसमें एससी, एसटी के साथ ओबीसी भी आएंगे। जिसके खिलाफ सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की कि इसमें उनके साथ होने वाले भेदभाव या झूठी शिकायत से संरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है, इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने इसे अस्पष्ट मानकर रोक लगा दी थी।
परंतु सवाल यह उठता है कि ओबीसी के छात्रों का शोषण या उनको प्रताड़ित कौन कर सकता है जबकि ओबीसी छात्र ही विश्वविद्यालयों में दबंग है और इस समय जो भी विश्वविद्यालयों में छात्र नेता हैं वह दबंग ओबीसी ही तो हैं वह किसी दूसरे को या यूं कहें कि जनरल कैटेगरी को आगे आने ही नहीं देते परन्तु भाजपा जिसका कोर वोटर ही जनरल कैटेगरी के हैं वह ऐसा क्यों कर रही है? भाजपा जनरल कैटेगरी के खिलाफ क्यों चल रही है? भाजपा यूजीसी के रूल में बदलाव क्यों करना चाहती है और जनरल छात्रों को कमजोर क्यों करना चाहती है? भाजपा जिस डाली में बैठी है उसी डाली को क्यों काटना चाहती है?
सभी जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के दखल को भाजपा शासित केंद्र सरकार कभी भी अध्यादेश लाकर के पलट सकती है।
अब इतना कुछ होने के बाद साफ पता चल रहा है कि भाजपा हमेशा की तरह, जनरल कैटेगरी को बहुत हल्के में ले रही है, जनरल कैटेगरी को दबाया जा रहा है। परन्तु जनरल कैटेगरी को समझ क्यों नहीं आ रहा है कि "माँ भी बच्चे को तब तक दूध नहीं पिलाती जब तक बच्चा रोता नहीं है"
हर 10 साल के बाद आरक्षण को बढ़ाने के लिए सरकारों ने संशोधन किए लेकिन जनरल कैटेगरी को हर बार अनदेखा किया गया
काका कालेलकर की रिपोर्ट बनी, मंडल कमीशन की रिपोर्ट बनी परंतु स्वर्णों पर जूं भी नहीं रेंगी, जनरल कैटेगरी सोती रही, आज पानी सर से भी ऊपर पहुँच गया है। क्योंकि राजनीतिक पार्टियों को सिर्फ और सिर्फ वोट से मतलब है. भाजपा जनरल कैटेगरी को भली भांति समझती है कि जनरल कैटेगरी वोट भाजपा को ही देंगे, चाहे जनरल कैटेगरी के साथ जितना भी बुरा कर लो, जनरल कैटेगरी को कुछ फर्क नहीं पड़ता ऐसी भाजपा की सोच है। इसलिए जनरल कैटेगरी आज खामियाजा भुगत रही हैं। अब समय आ चुका है कि जनरल कैटेगरी भी अपनी ताकत लोकतांत्रिक तरीके से दिखाए अगर जनरल कैटेगरी के साथ कोई भी विपक्षी पार्टी नहीं आती तो जनरल कैटेगरी को चाहिए कि वो संगठित होकर निर्दलीय प्रत्याशी खड़ा करें या जनरल कैटेगरी अपनी अलग पार्टी बनाए। अब भारतीय जनता पार्टी को यूजीसी में फेरबदल और आरक्षण का मोह छोड़ना पड़ेगा अगर भारतीय जनता पार्टी अब भी नहीं समझी तो आने वाला कोई भी चुनाव हो उसमें जनरल कैटेगरी भाजपा को सत्ता से बाहर उखाड़ फेंकेंगी।
साभार: संजीव पूरी (वरिष्ठ भाजपा नेता) डिप्टी चेयरमैन - पंजाबी विकास मंच


