आरएसएस@100: संघ को समझने की नई खिड़की
डॉ. पंकज सोनी (समीक्षक, आईआईएमटी विश्वविद्यालय मेरठ,के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)
वर्ष 2026 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए केवल शताब्दी वर्ष के उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आने वाले सौ वर्षों की कार्य-योजना और भविष्य की दिशा तय करने का महत्त्वपूर्ण वर्ष रहा है। वर्ष 1925 में स्थापित संघ 2025 में अपने सौ वर्ष पूरे कर चुका है और अब दूसरी शताब्दी की यात्रा पर अग्रसर है। इस ऐतिहासिक पड़ाव पर पत्रकारिता के दो विद्वानों- प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेंद्र सिंह, ने ‘आरएसएस@100’ पुस्तक का संपादन किया है। यह पुस्तक संघ के सौ वर्षों की यात्रा का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के साथ-साथ उसके वैचारिक आधार, वर्तमान भूमिका और भविष्य की संभावित दिशा को समझने का अवसर भी देती है। इस दृष्टि से यह अतीत के मूल्यांकन, वर्तमान के विश्लेषण और भविष्य की रूपरेखा को एक सूत्र में जोड़ने का प्रयास है।
संपादक प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेंद्र सिंह ने 35 आलेखों को एक सूत्र में पिरोकर इस पुस्तक का निर्माण किया है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, राजनाथ सिंह, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, डॉ. सदानंद दामोदर सप्रे, कैलाश चंद्र, श्री हितानंद शर्मा, धर्मेंद्र सिंह लोधी, डॉ. शाहिद अली, प्रमोद भार्गव, नितिन गर्गे, डॉ. शिवानी कटारा, डॉ. सौरभ मालवीय, गिरीश जोशी, प्रो. पवन सिंह और सुदर्शन व्यास सहित 35 लेखकों ने अपने आलेखों से पुस्तक को व्यापक और बहुआयामी बनाया है। साथ ही कुछ महापुरुषों के विचारों और पुराने लेखों को भी पुस्तक में शामिल किया गया है।
इन विशिष्ट स्वरों में संघ की यात्रा अलग-अलग दृष्टियों से उभरकर सामने आती है। केंद्रीय मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने संघ की यात्रा को सेवा, त्याग और राष्ट्रनिर्माण की यात्रा कहा है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने आलेख में सौ वर्षों की इस यात्रा को संगठन की तपस्या, त्याग, निःस्वार्थ सेवा, समर्पण और संकल्प की यात्रा बताया है। वहीं श्री कैलाश चंद्र ने इसे व्यक्ति के चरित्र-निर्माण से राष्ट्र-निर्माण तक की यात्रा के रूप में वर्णित किया है।
मोहिते के बाड़े से देश-दुनिया तक :
पुस्तक में डॉ. लोकेंद्र सिंह का आलेख संघ के आरंभ को जीवंतता को सामने रखता है। पहली शाखा नागपुर के मोहिते के बाड़े से शुरू हुई थी। संघ का नामकरण भी 17 अप्रैल 1926 की बैठक में सामूहिक सहमति से हुआ।
लेखक ने सौ वर्षों को चार चरणों, यानी संगठन, कार्य-विस्तार, सेवा-कार्यों को गति और सज्जन शक्ति के साथ कदमताल, में बाँटकर इस लंबी कथा को सुगम बनाया है। इसी आलेख में आँकड़ों के माध्यम से बताया गया है कि देश के लगभग 98 प्रतिशत जिलों में शाखाएँ और 83,129 दैनिक शाखाएँ) लगती हैं। जो संघ के सौ वर्षों के विस्तार की कहानी कहती हैं। डॉ. मोहन भागवत जी के आलेख में संघ की वैचारिक दृष्टि सीधे शीर्ष नेतृत्व के शब्दों में मिलती है। वे ‘हिन्दू’ शब्द का मर्म ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ बताते हैं। उनके अनुसार संघ तीन बातों पर अडिग है: व्यक्ति-निर्माण से परिवर्तन, संगठित समाज से स्वतः परिवर्तन, और यह कि हिन्दुस्थान हिन्दू राष्ट्र है। शेष बातों में संघ लचीला है। भविष्य की दिशा के रूप में वे सज्जनशक्ति को जोड़ने और समाज के ओपिनियन मेकर्स से निरंतर संवाद की बात करते हैं।
भ्रांतियों का सामना और संवाद - जहाँ प्रश्न पूछना भी स्वीकार्य है :
संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने संपादकीय में लिखा है कि किसी संगठन की परिपक्वता इससे दिखती है कि वह अपने ऊपर उठने वाले सवालों से कतराता है या उनका सामना करता है। ‘आरएसएस@100’ की बड़ी खूबी यह है कि वह कठिन प्रश्नों को किनारे नहीं करती, उन्हें सीधे सामने रखकर उत्तर देने का प्रयास करती है। संपादकीय ‘दिल से समझिए आरएसएस को’ इसकी भूमिका बाँधता है। उसके अनुसार संघ काम करता है, प्रचार नहीं करता; इसलिए वह आलोचनाओं का खंडन भी नहीं करता और भ्रम बने रहते हैं। पुस्तक इसी चुप्पी को संवाद में बदलती है।
डॉ. सदानंद दामोदर सप्रे अपने आलेख ‘कुछ भ्रांतियाँ एवं वस्तुस्थिति’ में बहुत सटीक बात लिखते हैं कि संघ के अनेक समर्थकों के मन में भी ‘संघ अच्छा तो है, किंतु…’ वाला भाव रहता है, और इस ‘किंतु’ के बाद जो आता है, उसकी वस्तुस्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। इसके बाद वे एक-एक प्रश्न उठाकर उसका उत्तर देते हैं।
उदाहरण के लिए, ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ क्या है? लेखक का तर्क है कि संघ ‘हिन्दू’ को संस्कृति-सूचक अर्थ में लेता है, उपासना-पद्धति के अर्थ में नहीं। वे तुर्कीस्तान, अफ़गानिस्तान और उज़्बेकिस्तान जैसे नामों का उदाहरण देते हैं, जहाँ देश का नाम राष्ट्रीयता बताता है, उपासना-पद्धति नहीं। वे यह भी कहते हैं कि ‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा’ में ‘हिंदी’ शब्द राष्ट्रीयता का सूचक है। संघ के एकात्मता स्तोत्र के संदर्भ में वे दादाभाई नौरोजी (पारसी), रसखान (मुस्लिम), गुरु नानक, भगवान महावीर और गौतम बुद्ध जैसे नामों का उल्लेख करते हैं। इनके सहारे वे दिखाते हैं कि संघ की प्रातः स्मरण परंपरा में विविध पंथों के महापुरुषों को याद किया जाता है।
संघ पर लगने वाले जातिगत आरोपों पर उनका तर्क है कि संघ में कुछ पाने की नहीं, देने की भावना होती है, और यही संघ के सामाजिक स्वरूप को समझने की कुंजी है। इसमें किसी भी जाति का व्यक्ति शामिल होकर भारत माता की सेवा कर सकता है। संवाद की परंपरा पर वे लिखते हैं कि संघ अपने विरोधी विचारधारा के लोगों से भी संवाद करता है और समय-समय पर उनका सम्मान भी करता रहा है। उदाहरण के रूप में वे पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, वैज्ञानिक डॉ. कस्तूरीरंगन और नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी के नाम गिनाते हैं। अंत में लेखक निवेदन करते हैं कि जिनके मन में संघ को लेकर प्रश्न हैं, वे संघ को निकट से देखें, समझें और स्वयं निष्कर्ष निकालें।
इसी संवादी स्वर को डॉ. शाहिद अली का आलेख ‘संघ का राष्ट्रवाद और हम’ आगे बढ़ाता है। अली संघ के राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक बताते हैं और संघ को देश का अकेला ऐसा सांस्कृतिक संगठन कहते हैं जिसने सौ वर्ष की यात्रा पूरी की है। वे सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के उस आग्रह की चर्चा करते हैं जिसमें वे राष्ट्रीय सौहार्द और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सम्मेलनों में संवाद पर बल देते हैं। लेखक इस सिलसिले को समाज के लिए लाभकारी मानते हैं।
इस पुस्तक में संघ के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों, जैसे शाखा, गणवेश, सदस्यता, महिलाओं की भूमिका (राष्ट्र सेविका समिति, 1936) और संघ से जुड़े संगठनों की स्थिति, के सीधे उत्तर दिए गए हैं। पुस्तक की यही खासियत इसे साधारण स्मारक-ग्रंथ से अलग बनाती है।
पुस्तक को क्यों पढ़ें?
संघ के बारे में क्रमबद्ध जानकारी: संघ की स्थापना-कथा, शिक्षा, सेवा, महिलाएँ, युवा शक्ति, गौ सेवा, पर्यावरण, पंच परिवर्तन, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और सोशल मीडिया तक, सब कुछ एक ही पुस्तक में सिमटा है।
भ्रांतियों पर सीधा संवाद: ‘कुछ भ्रांतियाँ एवं वस्तुस्थिति’ जैसे आलेख और ‘अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न’ (FAQ) वाला परिशिष्ट संघ से जुड़े कठिन प्रश्नों से कतराते नहीं, बल्कि उन्हें सीधे सामने रखकर उनके उत्तर देते हैं।
संदर्भ की सुविधा: ‘सौ साल की यात्रा के घटनाक्रम’ में 1925 से 2016 तक की प्रमुख तिथियाँ एक जगह मिलती हैं, जो शोध और जानकारी दोनों में काम आएँगी।
नए पाठक के लिए प्रवेश-द्वार: शाखा, गणवेश, सदस्यता और महिलाओं की भूमिका जैसे बुनियादी सवालों के सरल उत्तर बिना भारी शब्दावली के दिए गए हैं।
मीडिया के विद्यार्थियों के लिए केस-स्टडी: सोशल मीडिया वाला अध्याय किसी संगठन के पारंपरिक और डिजिटल संवाद के रिश्ते को समझने का अच्छा उदाहरण है।
सहज भाषा और संक्षिप्त आलेख: पुस्तक को कहीं से भी पढ़ना शुरू किया जा सकता है और हर आलेख अपने-आप में पूरा है।
कुल मिलाकर ‘आरएसएस@100’ संघ की सौ वर्ष की यात्रा का भावपूर्ण दस्तावेज़ है और 2026 में संघ की नई यात्रा को समझने की एक उपयोगी खिड़की भी।
पुस्तक: आरएसएस@100
संपादक: प्रो. संजय द्विवेदी एवं डॉ. लोकेंद्र सिंह
प्रकाशक: शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नईदिल्ली
मूल्य : 450 रुपये


