देश विरोधी मानसिकता से बाज आएं आतंकियों की महबूबा और जिहादियों की अब्दुल्ला - विनोद बंसल
जब कश्मीर घाटी में अलगाव वादी व जिहादी निर्दोष हिंदुओं को चुन चुन कर मार रहे थे, तब ये और इनके पूर्वज मौन थे। जब अल फलाह जैसे जिहादी अड्डे बने तब भी ये सब मौन थे। अभी, जब जिहादी डॉक्टरों का आतंकी मॉड्यूल ब्लास्ट हुआ, तब ये चुप थे। जब आतंकी खुद ब्लास्ट हुआ, तब भी चुप थे। जब ऐतिहासिक लालकिले के सामने निर्दोषों का लहू बहाया गया तब भी ये चुप थे ये कहना है विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल का।
किन्तु जैसे ही आतंकियों के महल ढहे, इनके दिल के अरमा आंसुओं में बह गए! ना सिर्फ आतंकियों की महबूबा अपितु जिहादियों के अब्दुल्लाओं का मौन टूट गया। घर आतंकियों के गिरे, पर गाज इन दोनों के दिल पर गिरी। भारत में रहते हुए भी फिर पाकिस्तान याद आ गया।
आतंकियों की लाशें बिछती देख कश्मीरी युवकों को जिहाद के लिए जान देने हेतु उकसाने वाले अब कहने लगे कि "आपको कश्मीर के लिए जीना है। जीना सीखो, मरना नहीं। हमें तुम्हारी लाशें नहीं, तुम चाहिए।” महबूबा कहती हैं कि "जम्मू-कश्मीर के युवाओं का दम घुट रहा है।
जिहादी डॉक्टरों की करतूतों को जस्टीफाई करते हुए उनकी महबूबा कहती हैं “उनका (जम्मू-कश्मीर के युवाओं का) दम मत घोंटिए। जब आप प्रेशर कुकर जैसी कोई चीज बंद करते हैं, तो वह कहीं न कहीं से निकल ही आती है।” दम युवाओं का नहीं, जिहादी राजनीति का घुट रहा है। उन्हें यह समझना चाहिए कि जब गीदढ़ की मौत आती है तो वह शहर की ओर दौड़ता है। अब तो आतंकी जहां से भी निकलेंगे, वहीं पर ढेर होंगे।
कोई इन मोहतरमा और अब्दुल्लाओं को समझाओ कि इन घटनाओं में कहीं भी हिन्दू-मुस्लिम नहीं, सिर्फ जिहाद और जिहादी मानसिकता ही है जो उन्हें मौत के मुंह में धकेल रही है। आप ही ने कहा था कि धारा 370 हटाई तो कश्मीर घाटी में कोई तिरंगा पकड़ने वाला भी नहीं मिलेगा। अब लालचौक के साथ घाटी की गलियों में भी तिरंगा लहराने वाले ही नहीं वन्देमातरम गाने वाले भी वहाँ तेज गति से बढ़ रहे हैं। हाँ नहीं मिलेंगे तो अब आतंकियों के जनाजे में जाने वाले नहीं मिलेंगे।
अब इस कथित कश्मीरी नेतृत्व को जिहादियों और आतंकियों के तुष्टीकरण की बजाए राज्य और देश की सुरक्षा और विकास में ध्यान लगाना चाहिए। अन्यथा अभी तो आतंक और आतंकियों पर प्रहार हुए हैं अब कट्टरपंथ और जिहाद पर भी प्रहार की बारी है।


