धर्मपरायण देश और आस्था का सैलाब पर किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं - रवि सरीन
भारत में कदाचित संसार में सबसे अधिक धर्मस्थल होंगे। धर्म और धार्मिक मान्यताएं तथा परंपराएं भी अनगिनत हैं लेकिन अंधविश्वास, प्रपंच और आस्था की तिगड़ी का ऐसा त्रिकोण बनता है कि लोगों को अपना भावनात्मक और आर्थिक शोषण न तो दिखाई देता है और न ही कोई मायने रखता है ।
खिलवाड़
भारत लगभग साढ़े सात लाख गाँवों, साढ़े छह सौ ज़िलों और आठ हज़ार शहरों का देश है। तक़रीबन पचास लाख मंदिर, 8 लाख मस्जिद, बारह हज़ार गुरुद्वारे और दस हज़ार से अधिक गिरिजाघर होंगे। यहां हर गली में घंटी बजती है, हर चौराहे पर अजान होती है। यीशु की प्रतिमा, पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ कानों में पड़ता है। मतलब यह कि आस्था हमारी सांसों में बसती है, श्रद्धा हमारी दिनचर्या का अंग और घोर संकट या साधारण परेशानी के लिए या बीमारी में सबसे पहले अपने आराध्य की शरण में जाते हैं और किसी से भी अधिक उस पर विश्वास करते हैं।
जो इनकी देखरेख करते हैं, वे भी सत्तर से सौ लाख तो होंगे ही लेकिन अधिकतर अनपढ़, कम पढ़े लिखे और कुछेक ही शिक्षित होंगे। इनका और इनकी बात का असर इतना है कि ग्रहों की चाल बताने और भविष्य का लेखा जोखा करने में इन्हें सबसे अधिक निपुण माना जाता है। किसी अवसर या अनुष्ठान या जन्म और विवाह से लेकर अंतिम संस्कार तक इनकी ही तूती बोलती है और इनकी प्रत्येक बात अकाट्य होती है।शुभ मुहूर्त निकलवाया तो ये ज्यादातर अपनी सुविधा के हिसाब से जोड़ घटा करने के बाद ऐसा समय और तारीख़ बताते हैं कि चाहे आपकी कितनी भी व्यस्तता या मज़बूरी हो, इनकी ही बात मानी जाती है। अगर आनाकानी की तो विघ्न बाधाएँ और अनहोनी की आशंका से हारना ही पड़ेगा।
अब एक उदाहरण देखिए। नोएडा जो कभी गाँव था, वहाँ पेड़ पौधे थे। जब विकास हुआ और शहर स्थापित होने लगा तो सड़कें भी बनीं। सेक्टर 28 के पास एक पीपल का पेड़ था। सड़क जब बनी तो यह बीच में आ गया। किसी चतुर ने इसकी जड़ों के पास चबूतरा बना दिया और एक मूर्ति तथा फूल माला डाल दी। आज तक किसी अधिकारी या नेता की हिम्मत नहीं हुई कि इसे वहाँ से हटा सकें, चाहे कितने भी बड़े हादसे हो जाएं।ऐसे न जाने कितने मंदिर, दरगाह, मस्जिद और चर्च तथा गुरुद्वारे हैं जो ट्रैफिक मैनेजमेंट को झुका सकते हैं लेकिन उन्हें हटाना टेढ़ी खीर है। छतरपुर में शनिधाम का मालिक ढोंगी बलात्कारी लेकिन पावरफुल बाबा कानून को धता बताकर कितनों की अस्मत और धन लूटने में कामयाब रहा क्योंक किसी भी पूजा स्थल में इस तरह की वारदात मामूली मानी जाती है।गांवों में जो एक दो पुजारी होते हैं, उनका खर्चा चढ़ावे या कहीं से खाने पीने की सामग्री आ जाए या बस ऐसे ही कोई दे दे, उससे चलता है। भजन करना मुख्य कार्य है। विसंगति है कि तिरुपति में एक दिन का एक करोड़ और गाँव में दस बीस रुपये रुपये हक़ीक़त है। मस्जिदों के मालिक वक़्फ़ के बारे में कुछ न कहना बेहतर और पादरियों के किस्से भी कोई कम नहीं। बहती गंगा में हर कोई डुबकी लगाता मिलेगा।
विडंबना
अब हम इस बात पर आते हैं कि इस सब के सामने शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति क्या है और क्या हमारे विकास का संतुलन बिगड़ गया है ? स्कूल लगभग 15 लाख होंगे और दो लाख स्वास्थ्य केंद्र। अस्पताल भी दो हज़ार होंगे। लेकिन हर गाँव में 5-6 धर्मस्थल मिल जाएंगे पर डॉक्टर के लिए 20 गाँव का चक्कर लगाना पड़ेगा। हर 1 स्कूल के बदले 2.5 धर्मस्थल हैं।मतलब ये बिल्कुल नहीं कि धर्मस्थल गलत हैं। कोरोना और बाढ़ में सबसे पहले लंगर, भंडारा और कंबल धर्मस्थलों से ही निकलते हैं। संकट में ये समाज की रीढ़ बनते हैं।असली समस्या "संतुलन" की है।इसके अतिरिक्त धर्म के लबादे में छिपे भेड़ियों की पहचान करने की कोई व्यवस्था नहीं है और क़ानून की पहुँच उन तक या तो होती नहीं या बहुत देर से होती है और तब तक पंछी यानी गुनाहगार उड़ चुका होता है।
सच का सामना यह कि ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में तीस पैंतीस हज़ार सरकारी डॉक्टर; नतीजा - बुखार आए तो पहले ओझा, झोलाछाप और फ़िर डॉक्टर। शिक्षा का आलम यह कि शहरों में स्मार्ट क्लास और गाँव में एक चौथाई स्कूलों के पास अपना भवन भी नहीं, जो टूटे फूटे ख़ाली मकान मिले उनमे सरपंच या मुखिया ने स्कूल खोल दिया क्योंकि सरकार चाहती है कि सर्व शिक्षा अभियान कामयाब हो। अक्सर ताला लगे इन शिक्षा मंदिरों के दरवाजे तब ही खुलते जब कोई नेता वहां भाषण देने जाता है और बच्चे तब आते हैं जब मिड डे मील बाँटना होता है। टीचर जी पहले खेत खलिहान देखते हैं और कभी सुस्ताने या दोस्तों की महफ़िल में यहाँ आते हैं। यहाँ स्टूडेंट मिल जाएँगे लेकिन विद्यार्थी नहीं। नतीजा - 10वीं पास बच्चा नौकरी के लिए शहर भागता है।सरकारी स्कूल-अस्पताल का बजट आता है, पर दवा और टीचर की कौन कहे, बताया पता या स्थान ही नदारद रहते हैं। परिणाम ; प्राइवेट स्कूल तथा ट्यूशन पढ़ाने वालों और बिना डिग्री डॉक्टरों की बल्ले बल्ले। सरकार ने हेल्थ सेंटर और स्कूल बनाए, पर स्टाफ और मेंटेनेंस पर ध्यान नहीं दिया।
क्या भूलें और क्या कहें?
हमने आस्था को जिंदा रखा, पर सवाल पूछना बंद कर दिया। पूजा या इबादत के लिए जगह सबसे ज्यादा पर पढ़ने और इलाज के लिए सबसे कम।भूल गए कि धर्मस्थल हमें स्वर्ग, जन्नत या बहिश्त का रास्ता दिखाते हैं, स्कूल दुनिया में चलना और चिकित्सालय सेहतमंद रहना सिखाते हैं।सरकारों की हालत यह कि कोई ग़रीबी हटाने के नाम पर बनती है तो दूसरी आओ स्कूल चलो के नारे से सत्ता में आती है और तीसरी मंदिर बनने की उम्मीद पर क़ाबिज़ हो जाती है।
निकम्मे और निठल्लेपन की हद तब होती है जब पाँच साल बाद इनसे लेखा जोखा तलब करे तो यह उसकी आवाज़ खामोश करने के लिए मुँह में लॉलीपॉप डाल देते हैं। इन्हें कौन समझाए; ये जागते हुए सोने का नाटक करते हैं और अंधेरों को उजाले में बदलने की रिश्वत देकर ऐसा खेल रचते हैं कि दुनिया में इनके जैसा कोई नहीं। पीठ में छुरा भोंकने को राजनीति का पाठ मानने वालों के लिए अन्ना हजारे या सोनम वांगचुक अथवा बापू भी धरती पर आ जाएं, अनशन या बलिदान का कोई अर्थ नहीं रह गया है। चील कौवे और गिद्ध ताक लगाये बैठे हैं कि कब उन्हें अपने मनपसंद भोजन के लिए नीचे उतरना है। इसलिए स्वयम् सिद्ध होना होगा।


