जंतर-मंतर पर प्रतिबंध: व्यवस्था का स्वागत, लेकिन छोटे संगठनों की आवाज़ की चिंता भी - सुरेन्द्र गुप्ता

जंतर-मंतर पर प्रतिबंध: व्यवस्था का स्वागत, लेकिन छोटे संगठनों की आवाज़ की चिंता भी - सुरेन्द्र गुप्ता

दिल्ली। जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन को लेकर सरकार के कदम के पीछे व्यवस्था, सुरक्षा और दिल्ली के जनजीवन को सुचारु बनाए रखने की चिंता को समझा जा सकता है। जब विरोध-प्रदर्शन अपनी मर्यादा लाँघने लगें और आम नागरिकों को परेशानी होने लगे, तब व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाना आवश्यक हो जाता है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पक्ष भी है, जिस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। क्या कुछ लोगों और बड़े संगठनों की मनमानी की सजा उन छोटे संगठनों को भी मिलनी चाहिए, जिनकी आवाज़ सरकार तक पहुँचने का एकमात्र सहारा जंतर-मंतर जैसा स्थान था?

देश के दूर-दराज़ क्षेत्रों से आने वाले छोटे सामाजिक, धार्मिक और जनहित के संगठन सीमित संसाधनों के साथ अपनी समस्याएँ लेकर दिल्ली पहुँचते हैं। उनके पास न बड़ी भीड़ जुटाने की ताकत होती है, न व्यापक प्रचार के साधन। जंतर-मंतर उनके लिए केवल एक धरना स्थल नहीं, बल्कि अपनी बात सरकार तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब बड़े संगठन अपनी संख्या, राजनीतिक प्रभाव अथवा शक्ति का प्रदर्शन करते हुए मर्यादाओं की अनदेखी करते हैं, तब उसका खामियाजा छोटे संगठनों को भी भुगतना पड़ता है। विपक्षी दलों की अति हो या CJP जैसे संगठनों के विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी विवादित गतिविधियाँ—किसी भी आंदोलन में यदि आम जनता का जीवन बाधित होता है, तो अंततः उसकी कीमत उन लोगों को भी चुकानी पड़ती है, जिनका उद्देश्य केवल अपनी बात रखना होता है।

समाधान प्रतिबंध और अधिकारों के बीच संतुलन में है।

क्यों न जंतर-मंतर पर 200 लोगों तक के छोटे, शांतिपूर्ण और पूर्व अनुमति प्राप्त प्रदर्शनों की व्यवस्था बनाई जाए? और जो संगठन अपनी संख्या-शक्ति का बड़ा प्रदर्शन करना चाहते हैं, उनके लिए रामलीला मैदान जैसे बड़े स्थल निर्धारित किए जाएँ।

इससे व्यवस्था भी बनी रहेगी, दिल्ली के नागरिकों को अनावश्यक परेशानी भी नहीं होगी और छोटे संगठनों की आवाज़ भी दबने से बचेगी। यह प्रस्ताव संबंधित प्रशासन की अनुमति, सुरक्षा मानकों और लागू नियमों के अनुरूप विचारणीय है।

मेरा स्पष्ट मत है कि विरोध का अधिकार है, लेकिन अराजकता का अधिकार किसी को नहीं है। सरकार की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जनता को बंधक बनाना, सार्वजनिक जीवन बाधित करना और नियमों की अवहेलना करना किसी भी आंदोलन की मर्यादा नहीं हो सकती।

बड़े हों या छोटे, राजनीतिक हों या गैर-राजनीतिक—सभी संगठनों को यह समझना होगा कि आंदोलन की सफलता केवल भीड़ की संख्या से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य, अनुशासन और जनहित के प्रति संवेदनशीलता से तय होती है।

लोकतंत्र में सरकार की व्यवस्था भी आवश्यक है और जनता की आवाज़ भी।

आइए, ऐसी व्यवस्था की माँग करें जिसमें न अराजकता को संरक्षण मिले, न छोटे संगठनों की आवाज़ अनसुनी हो और न किसी के अधिकारों की कीमत पर दूसरे की शक्ति का प्रदर्शन हो।

मर्यादा भी रहे, व्यवस्था भी रहे और लोकतंत्र में संवाद के द्वार भी खुले रहें।

साभार — सुरेन्द्र कुमार गुप्ता (उपाध्यक्ष) विश्व हिन्दू परिषद (इंद्रप्रस्थ प्रांत) एवं अध्यक्ष, इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण न्यास