समाज के नाम खुला पत्र: ‘भ्रांति और सत्य’ के माध्यम से युवाओं के वास्तविक प्रतिनिधित्व पर विमर्श की पहल
इंद्रप्रस्थ प्रांत की लगभग 1,000 सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक संस्थाओं के प्रमुखों को भेजा खुला पत्र
नई दिल्ली | विश्व हिन्दू परिषद, इंद्रप्रस्थ प्रांत के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण न्यास के अध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार गुप्ता ने इंद्रप्रस्थ प्रांत की लगभग 1,000 सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक संस्थाओं के प्रमुखों को व्यक्तिगत नाम से एक खुला पत्र भेजा है। ‘भ्रांति और सत्य : आखिर भारत के युवाओं का प्रतिनिधित्व कौन करता है?’ शीर्षक से लिखे इस पत्र के माध्यम से उन्होंने युवा समाज की विविधता, राष्ट्रनिर्माण में उसकी भूमिका और आंदोलनों के माध्यम से युवाओं के प्रतिनिधित्व के दावों पर व्यापक सामाजिक विमर्श का आह्वान किया है।

पत्र में सुरेन्द्र कुमार गुप्ता ने कहा है कि भारत के युवाओं की पहचान केवल आंदोलनों, राजनीतिक संगठनों अथवा मीडिया में दिखाई देने वाले चेहरों तक सीमित नहीं की जा सकती। देश का एक बड़ा युवा वर्ग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं, विश्व हिन्दू परिषद एवं बजरंग दल की गतिविधियों, धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों, सामाजिक सेवा कार्यों तथा विभिन्न संस्थागत प्रयासों में सक्रिय है। इसके साथ ही लाखों युवा मेहनत-मजदूरी, नौकरी, छोटे व्यापार और उद्यमिता के माध्यम से अपने परिवारों का भरण-पोषण करते हुए देश की अर्थव्यवस्था और समाज के निर्माण में योगदान दे रहे हैं।
उन्होंने अपने पत्र में इस बात पर बल दिया है कि धर्मनिष्ठा, सांस्कृतिक पहचान, संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान, स्वबोध और आधुनिक ज्ञान के प्रति खुलापन परस्पर विरोधी नहीं हैं। भारतीय युवा अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक तकनीक, शिक्षा, उद्यमिता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी आगे बढ़ सकता है।
पत्र में शिक्षा, बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों से संबंधित युवाओं की समस्याओं को गंभीर सामाजिक प्रश्न बताते हुए कहा गया है कि इन मुद्दों पर आंदोलनों का समर्थन करना युवाओं का लोकतांत्रिक अधिकार है। हालांकि, किसी एक आंदोलन में युवाओं की भागीदारी को पूरे देश के युवा समाज का प्रतिनिधित्व मान लेना उचित नहीं होगा। किसी भी संगठन के प्रतिनिधित्व के दावे का मूल्यांकन उसके उद्देश्यों, नेतृत्व, कार्यप्रणाली और वास्तविक जनसमर्थन के आधार पर किया जाना चाहिए।
सुरेन्द्र कुमार गुप्ता ने पत्र में CJP जैसे संगठनों की वैचारिक दिशा और राजनीतिक भूमिका पर भी प्रश्न उठाए हैं। उनका मत है कि युवाओं को किसी भी संगठन या राजनीतिक उद्देश्य का माध्यम मानने के बजाय उनकी स्वतंत्र सोच, आकांक्षाओं और लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।
पत्र में प्रशांत भूषण सहित सार्वजनिक जीवन के उन व्यक्तित्वों के राजनीतिक दृष्टिकोण पर भी विमर्श किया गया है, जो व्यवस्था अथवा सत्ता परिवर्तन की बात करते हैं। इसमें कहा गया है कि राजनीतिक परिवर्तन की आकांक्षा के साथ-साथ जनता के सामने विश्वसनीय वैकल्पिक दृष्टि, स्पष्ट कार्यक्रम और जनहित से जुड़े ठोस समाधान प्रस्तुत करना भी आवश्यक है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वैचारिक मतभेदों का समाधान हिंसा, व्यक्तिगत आक्षेप अथवा धमकी से नहीं, बल्कि तथ्यों, तर्क, संवाद और लोकतांत्रिक तरीकों से होना चाहिए।
सुरेन्द्र कुमार गुप्ता ने अपने खुले पत्र के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों और संस्थाओं से आग्रह किया है कि वे युवाओं की भूमिका तथा उनके प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर गंभीरता से विचार करें। उनके अनुसार, राष्ट्रनिर्माण में उन युवाओं के योगदान को भी समान महत्त्व मिलना चाहिए, जो बिना किसी प्रचार के सामाजिक सेवा, सांस्कृतिक गतिविधियों, पारिवारिक दायित्वों, श्रम और उद्यमिता के माध्यम से देश के भविष्य को मजबूत बना रहे हैं।
इस पहल का उद्देश्य युवाओं की वास्तविक आकांक्षाओं, सामाजिक योगदान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर स्वस्थ वैचारिक चर्चा को प्रोत्साहित करना है।


