ईवीएमएस ने कानून की धज्जियां उड़ाते अवैध ई-रिक्शों पर चिंता जताई
नई दिल्ली - पूरे भारत के 200 से अधिक संगठित और एमएसएमई ईवी निर्माताओं के संघ इलैक्ट्रिक वेइकल मैन्युफैक्चरर्स सोसायटी ;ईवीएमएस ने आज प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक प्रेस वार्ता कर भारतीय इलेक्ट्रिक परिवहन के क्षेत्र की दो बड़ी चुनौतियां सामने रखी। इनमें एक गैर-कानूनी ढंग से ई-रिक्शा का संचालन और दूसरा निम्नस्तरीय गुणवत्ता के आयात में बेतहासा वृद्धि शामिल है।
सत्र की अध्यक्षता ईवीएमएस के महासचिव और 25 से वर्षों से अधिक के अनुभवी इस उद्योग के दिग्गज श्री राजीव तुली ने की। उन्होंने इन गंभीर चिंताओं को दूर करने के लिए मजबूती से कुछ अहम बातें रखीं जैसे तत्काल नीतिगत कदम उठाना, नियामक स्पष्ट करना और सभी भागीदारों का इस दिशा में एकजुट प्रयास।
भारत की स्वच्छ परिवहन क्रांति में सबसे महत्वपूर्ण योगदान देने वालों में ई-रिक्शा सबसे तेजी से सामने आया है। आज देश भर में 50 लाख से अधिक ई-रिक्शा चल रहे हैं। इन्हें ई-रिक्शा और ई-कार्ट के लगभग 500 एमएसएमई निर्माताओं का आधार मिला है। इस सेक्टर के बढ़ने से पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक लाभ दोनों मिल रहे हैं।
ई-रिक्शा पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक लाभ देते हैं। वे प्रतिदिन 1 अरब से अधिक ग्रीन किलोमीटर की दूरी तय करते हुए लगभग 4 लाख मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन कम कर रहे हैं। यह लाभ 2 अरब पेड़ लगाने के बराबर है। इनका चलन बढ़ने के साथ ये 98 प्रतिशत पैर से चलने वाले रिक्शा की जगह ले चुके हैं। इससे हर दिन लगभग 50 मिलियन लीटर पेट्रोल की बचत होती है और भारत पर ईंधन आयात का बोझ कम होता है। इस सेक्टर में खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में 50 लाख से अधिक लोग प्रत्यक्ष और 75 लाख से अधिक लोग अप्रत्यक्ष रोजगार कर रहे हैं।
आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों को रोजगार मिल रहे हैं। ई-रिक्शा किफ़ायती और कारगर हैं इसलिए लास्ट-माइल कनेक्टिविटी के लिए लाखों लोगों की पसंद बन गए हैं। ये सभी महानगरों के मेट्रो रेल नेटवर्क को सहयोग दे रहे हैं। लेकिन ऐसे तमाम योगदान के बावजूद ई-रिक्शा के बारे में गलत धारणाएँ बनी हुई हैं। इस संबंध में ईवीएमएस ने यह स्पष्ट किया कि सुरक्षा को लेकर जो भी चिंताएँ हैं मुख्य रूप से अवैध, अपंजीकृत और अस्तरीय वाहनों की वजह से हैं। ये वाहन नियामकों का अनुपालन नहीं करते हैं।
दूसरी ओर अनुपालन करने वाले ई-रिक्शा के प्रमाणन और पंजीकरण से पहले उन्हें अधिकृत एजेंसियों के कठोर परीक्षण से गुजरना होता है। यातायात में बाधक और असुरक्षित होने की बात उन वाहनों पर लागू होती है जो नियामकों का पालन नहीं करते हैं। ज़िम्मेदार निर्माताओं के ई-वाहन मान्यताप्राप्त और सड़कों पर चलने के लिए सुरक्षित हैं। इस सिलसिले में ईवीएमएस प्राधिकारणों के साथ मिल कर फिटनेस जांच सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहा है। साथ ही, अवैध वाहनों को जब्त किए जाने पर जोर देगा।
आज यह समझना जरूरी है कि वैध, नियामक अनुपालन करने वाले और अवैध, अस्वीकृत ई-रिक्शा इन सब के बीच क्या अंतर है। ई-रिक्शा वैध है यदि सड़क परिवहन का पंजीकरण, एक नंबर प्लेट, एक चेसिस नंबर, एक नियमाक अनुपालन प्लेट, बीमा और फिटनेस प्रमाणपत्र है। ये वाहन मान्यताप्राप्त ओईएम पार्ट्स लगाते हैं और सुरक्षा और गुणवत्ता के सभी मानकों को पूरा करते हैं।
दूसरी ओर, अवैध ई-रिक्शा अक्सर बिना पंजीकरण, नंबर प्लेट या वैध चेसिस नंबर के चलते हैं। बड़ी संख्या में पैडल रिक्शा इलेक्ट्रिक वाहन में बदल दिए गए हैं। ये सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरते। इनके पास न तो कम्प्लायंस प्लेट और न ही बीमा होता है। इन्हें बनाने के लिए निम्न-स्तरीय पार्ट लगाए जाते हैं जो जांचे-परखे नहीं होते हैं। फिटनेस सर्टिफिकेट या सड़क पर चलने की योग्यता का प्रमाण नहीं मिलने की वजह से ये वाहन यात्रियों के लिए जोखिम पैदा करते हैं और इस सेक्टर की विश्वसनीयता तार-तार कर रहे हैं।
इस सेक्टर की तेजी को लेकर कोई संदेह नहीं है, परंतु अवैध ई-रिक्शा की बेलगाम वृद्धि एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। ईवीएमएस के अनुमान से आज लगभग 4.75 लाख अपंजीकृत ई-रिक्शा भारतीय शहरों में चल रहे हैं। इनके लिए चालक का प्रमाणन या पंजीकरण जैसी कोई जरूरी चीज लागू नहीं होती है।
ईवीएमएस के महासचिव राजीव तुली ने बताया कि सुव्यवस्थित पंजीकरण प्रक्रिया के अभाव में अवैध ऑपरेटर फल-फूल रहे हैं। इससे न सिर्फ सार्वजनिक सुरक्षा खतरे में है, बल्कि उन निर्माताओं के लिए गैर-कानूनी ढंग से प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है जो गुणवत्ता में निवेश और नियामक अनुपालन करते हैं।
इस बीच अस्तरीय ईवी कम्पोनेंट और चेसिस का आयात तेजीे से बढ़ने के चलते यह चुनौती और बढ़ गई है। 2021 और 2024 के बीच मोटर आयात 320 करोड़ रु. से बढ़कर 870 करोड़ रु. हो गया, जबकि कंट्रोलर का आयात 140 करोड़ रु. से बढ़कर 410 करोड़ रु. का हो गया। इन आयातों में बड़ा हिस्सा खास कर चीन से होता है जो भारतीय गुणवत्ता मानकों को पूरा नहीं करता है और स्वदेशी परिचालन व्यवस्था के लिए हानिकारक है।


