आज की रचना : शीर्षक “दहेज दानव”

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दहेज दानव दावा नल, बन बेटियों को हर पल जला रहा है।, वो लालच का रूप पकड़, रिश्तों की चूलें हिला रहा है।
जब बहू किसी की किसी की बेटी, घर आंगन में जलती है।
हत्या होती तब रिस्तों की, अरमानों की होली जलती है।। 1,।।
ये दहेज दानव का डर है, जो भ्रूणहत्याये करवा ता है।
बेटियां पेट में मरवाता है, ससुराल में दूल्हे मरवाता है।
सुख चैन छीन लेता जीवन से, जेल की चक्की पिसवाताहै।
हर घर में वो घुस बैठा है, सारे गुनाह वो करवाता है।। 2।।
उस दहेज दानव के चलते, इक दिन ऐसा आयेगा। बेटियां न होंगी इस जग में, किस कोख़ जनम तू पायेगा।
जीवन होगा नर का नीरस, बेटियां न होगी इस जग में।
फिर अपना वंश चलाने वाली, दूल्हन कहाँ से लायेगा।। 3।।
मत दे दहेज मत ले दहेज, रिश्ते तूं दिल से बनाये जा।
दहेज दानव का कर विरोध, हर चौखट पर अलख जगाने जा।।
ये लालच बन बैठा है, इसको मार भगाना होगा।
दानविय प्रथा की बुराई से , सारा समाज बचाना होगा।
अब सभी को मिल कर के, दहेज दानव से लड़ना होगा।
उसकी पराजय जैसे हो, हमें मिलकर ही कुछ करना होगा।। 4।।
रचना कार—सूबेदार

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